गुंडा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक और सम्पत्ति विरूपण निवारण विधेयक लोकतांत्रिक आवाजों के दमन का नया हथियार: रिहाई मंच

वनांचल एक्सप्रेस ब्यूरो

लखनऊ। रिहाई मंच ने उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में पेश उत्तर प्रदेश गुंडा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक-2021 और सम्पत्ति विरूपण निवारण कानून-2021 को लोकतांत्रिक आवाजों के दमन का नया हथियार बताया है। साथ ही मंच ने कहा है कि दोनों विधेयकों के जरिए उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार राज्य को पुलिस स्टेट में बदलना चाहती है और विरोधियों का दमन करना चाहती है।

रिहाई मंच के महासचिव राजीव यादव ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा कि गुंडा नियंत्रण (संशोधन) विधेयक के नए प्रावधानों की मंशा किसी भी व्यक्ति पर मनगढ़ंत आरोप लगाकर न्यायिक निस्तारण से पहले ही अधिक से अधिक समय तक जेल में रखने की है। हालांकि विधेयक विधान परिषद से पारित नहीं हो पाया और प्रवर समिति को भेज दिया गया है लेकिन इससे सरकार की नीति और नीयत को समझा जा सकता है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने अभी पिछले दिनों किसान नेताओं को जिस तरह से गुंडा एक्ट का नोटिस दिया था, उससे इसके लागू करने के तरीकों पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

राजीव ने कहा कि सम्पत्ति विरूपण निवारण कानून-2021 विधान सभा के बाद विधान परिषद से भी पारित करवाया जा चुका है। पूर्व की भांति इसके दुरुपयोग की प्रबल संभावना है। विगत में सीएए/एनआरसी विरोधी आंदोलनों के दौरान विरोध के स्वर का दमन करने के लिए साजिश के तहत पहले अराजक तत्वों को हिंसा व तोड़फोड़ करने दिया गया और बाद में उसी की आड़ में शांतिपूर्ण आंदालनकारियों को प्रताड़ित किया गया। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को प्रताड़ित करने का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरकार नुकसान की भरपाई के लिए मार्च 2020 में अध्यादेश के माध्यम से कानून लेकर आई थी और उसे दिसम्बर 2019 की घटनाओं पर भी लागू करने का प्रयास किया था। सरकार का यह कदम बदले की भावना से उठाया गया था।

राजीव ने आरोप लगाया कि इसी तरह किसान ट्रैक्टर मार्च के दौरान दिल्ली में लालकिले पर होने वाली घटना का आरोप किसानों पर लगाया गया था लेकिन उसके मुख्य आरोपी का सम्बंध भाजपा के शीर्ष नेताओं से निकला। राजीव यादव ने कहा कि विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा को कभी सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन सम्पत्तियों के नुकसान के लिए कठोर कानून बनाने से पहले निर्दोषों को फंसाए जाने पर पुलिस की जवाबदेही तय होनी चाहिए। तोड़फोड़ करने वाले पुलिस कर्मियों या हिंसा कारित करने वालों के पुलिस के साथ पाए जाने पर पुलिस के खिलाफ पूर्व अनुमति की शर्त लगाए बिना उन्हीं धाराओं में मुकदमा चलाए जाने का प्रावधान किया जाना आवश्यक है। 

(प्रेस विज्ञप्ति)

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