मंगलवार, 2 मार्च 2021

BHU की दलित शिक्षिका से अनुभाग अधिकारी ने की बदसलूकी, धरने पर बैठीं

पत्रकारिता एवं जन संप्रेषण विभाग में कार्यरत एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शोभना नेरलीकर ने केंद्रीय कार्यालय के अनुभाग अधिकारी (अवकाश) सुरेंद्र मिश्रा पर लगाया जाति के आधार पर उत्पीड़न और बदसलूकी का आरोप। 

वनांचल एक्सप्रेस ब्यूरो

वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) की एक दलित शिक्षिका सोमवार को शिक्षण एवं प्रशासन अनुभाग के अनुभाग अधिकारी (अवकाश) पर बदसलूकी और उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए कार्यालय में ही धरने पर बैठ गईं। इससे विश्वविद्यालय प्रशासन में हड़कंप मच गया। प्राक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों ने शिक्षिका को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह आरोपी अनुभाग अधिकारी द्वारा माफी मांगे जाने और उनके सर्विस बुक में दर्ज लीव-विदाउट-पे को रेगुलर सर्विस के रूप में परिवर्तित किए जाने तक धरना पर बैठे रहने पर अड़ी रहीं। प्रशासनिक अधिकारियों और प्राक्टोरियल बोर्ड के सदस्यों के करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद आरोपी अनुभाग अधिकारी ने शिक्षिका से माफी मांगी लेकिन देर शाम तक उनके सर्विेस बुक में दर्ज लीव-विदाउट-पे को रेगुलर सर्विस के रूप में परिवर्तित नहीं किया जा सका। इससे नाराज शिक्षिका केंद्रीय कार्यालय के प्रवेश द्वार के सामने धरने पर बैठ गईं और देर शाम तक वहीं बैठी रहीं।

पत्रकारिता एवं जन संप्रेषण विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शोभना नेरलीकर सोमवार को अपने सर्विस बुक में दर्ज 13 दिनों (31-01-2013 से 12-02-2013 तक) के लीव-विदाउट-पे के मामले को लेकर कुल-सचिव कार्यालय स्थित शिक्षण एवं प्रशासन अनुभाग के अनुभाग अधिकारी (अवकाश) सुरेंद्र मिश्रा के पास पहुंचीं। दोनों के बीच कुछ विवाद हुआ। फिर डॉ. शोभना नेरलीकर सुरेंद्र मिश्रा पर जाति आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए फर्श पर धरने पर बैठ गईं।

वहीं, सुरेंद्र मिश्रा अपना पटल छोड़कर कहीं चले गए। मामले की जानकारी होने पर प्राक्टोरियल बोर्ड के अधिकारी और कर्मचारी मौके पर पहुंचे और शिक्षिका से धरना खत्म करने की गुहार लगाने लगे लेकिन उन्होंने धरना खत्म करने से साफ मना कर दिया है। उन्होंने साफ कहा कि जब तक आरोपी सुरेंद्र मिश्रा उनसे माफी नहीं मांगेंगे और उनके सर्विस बुक में दर्ज विवादित 13 दिनों के लीव-विदाउट-पे को रेगुलर सर्विस के रूप में परिवर्तित नहीं करेंगे, तब तक वह धरना खत्म नहीं करेंगे क्योंकि इस अवधि के दौरान उन्होंने विभाग में अपनी नियमित सेवाएं दी हैं। 

प्रॉक्टोरियल बोर्ड के सदस्य करीब दो घंटे तक आरोपी सुरेंद्र मिश्रा को खोजते रहे लेकिन वह नहीं मिले। करीब दो घंटे बाद सुरेंद्र मिश्रा आए और उन्होंने हाथ जोड़कर डॉ. शोभना नेरलीकर से माफी मांगी लेकिन वह विवादित 13 दिनों के लीव-विदाउट-पे को रेगुलर सर्विस के रूप में परिवर्तित किए जाने तक धरना पर बैठे रहने की बात पर अड़ी रहीं। 


उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन जाति आधार पर उनका उत्पीड़न कर रहा है क्योंकि वह दलित हैं। प्रशासनिक अधिकारी जान बूझकर उनके सर्विस बुक में छेड़छाड़ कर रहे हैं ताकि उनकी वरिष्ठता प्रभावित हो और वह विभागाध्यक्ष न बन सकें। यह तीसरी बार है जब उन्हें विभागाध्यक्ष बनने से वंचित किया गया है और विभागाध्यक्ष का प्रभार संकायाध्यक्ष को सौंपा गया है। कुछ देर के बाद वह कुल-सचिव कार्यालय से निकलकर केंद्रीय कार्यालय के गेट के सामने जमीन पर धरने पर बैठ गईं।


मामले की जानकारी होने पर पूर्व कृषि वैज्ञानिक प्रो. लालचंद प्रसाद, प्रो. एमपी. अहिरवार, प्रो. बृजेश कुमार अस्थवाल, डॉ. राहुल राज आदि मौके पर पहुंचे और शिक्षिका की समस्या को तत्काल हल किए जाने की मांग की। मामला बढ़ता देखकर संयुक्त कुल-सचिव कमलाकांत सहाय ने देर शाम तक विवादित लीव-विदाउट-पे के मामले को हल करने की कोशिश की लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। देर शाम तक डॉ. शोभना नेरलीकर केंद्रीय कार्यालय के गेट के सामने धरने पर बैठी रहीं। केंद्रीय कार्यालय से सभी प्रशासनिक अधिकारियों के जाने के बाद वह रात में वापस घर चली गईं। 

वनांचल एक्सप्रेस से हुई बातचीत में उन्होंने बताया कि वह मंगलवार को अपनी सात सूत्री मांगों को लेकर केंद्रीय कार्यालय के सामने फिर से धरने पर बैठेंगी और मांगे माने जाने तक वह वहीं बैठी रहेंगी। उनकी सात सूत्री मांगों में प्रमुख रूप से उनके सर्विस रिकॉर्ड में 31-1-2013 से 12-2-2013 तक के लीव-विदाउट-पे को रेगुलर सर्विस के रूप में जोड़ने, पत्रकारिता एवं जन संप्रेषण विभाग में कार्यरत डॉ. अनुराग दवे की गैर-कानूनी प्रोन्नति की जांच उच्च न्यायालय के कार्यरत न्यायमूर्तियों की निगरानी में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) से कराने, डॉ. अनुराग दवे के प्रोमोशन को तुरंत निरस्त करने, मामले की जांच होने तक प्रो. शिशिर बासु और डॉ. अनुराग दवे को विभाग के किसी भी प्रशासनिक कमेटी नहीं रखने, विश्वविद्यालय प्रशासन की आंतरिक जांच कमेटी में एससी, एसटी, ओबीसी और महिला प्रतिनिधि को शामिल किए जाने की मांग शामिल है। इसके अलावा उन्होंने विभाग की वरिष्ठ फैकल्टी होने की वजह से सभी विभागीय कमेटियों में स्वयं को शामिल किये जाने और उनके कोटे में रिक्त पदों पर शोधार्थियों को आबंटित किए जाने की मांग की है। 

डॉ. शोभना नेरलीकर द्वारा बीएचयू प्रशासन पर जाति आधार पर भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप लगाए जाने के बाबत विश्वविद्यालय के जन संपर्क अधिकारी डॉ. राजेश सिंह से बात करने की कोशिश की गई लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया।   

1 टिप्पणी:

  1. जहां शिक्षक सुरक्षित नहीं है वहां छात्र/छात्रा की क्या दशा होगी।

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