बुधवार, 24 दिसंबर 2025

BHU: आरक्षित वर्ग के शोधार्थियों का अनिश्चितकालीन धरना, जाति आधार पर सम्बद्ध महाविद्यालयों में भेजे जाने का आरोप

शोधार्थियों ने शैक्षिक सत्र (2024-25) के दौरान मुख्य परिसर स्थित इतिहास विभाग में शोध के लिए जमा किया था शुल्क। सम्बद्ध महाविद्यालयों में भेजे जाने के खिलाफ कर रहे विरोध। संवैधानिक आरक्षण के प्रावधानों के उल्लंघन का लगा रहे आरोप।

वनांचल एक्सप्रेस ब्यूरो

वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के इतिहास विभाग के 13 शोधार्थियों ने सोमवार को केंद्रीय कार्यालय के मुख्य द्वार पर अनिश्चितकालीन धरना शुरू कर दिया। उनका यह धरना अगले दिन भी जारी रहा। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने मुख्य परिसर स्थित इतिहास विभाग में प्रवेश हेतु उनसे फीस जमा कराया लेकिन आठ महीना बीत जाने के बाद उन्हें विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में प्रवेश दे दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने जाति आधार पर उनका प्रवेश सम्बद्ध महाविद्यालयों में किया है जो भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता के अधिकार का उल्लंघन है। धरनारत शोधार्थियों ने पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया में आरक्षण के प्रावधानों के उल्लंघन का आरोप भी लगाया है।

धरनारत शोधार्थी चांदनी यादव ने बताया कि पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया (2024-25) के तहत मार्च में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में कुल 43 शोधार्थियों का प्रवेश लिया गया। इनमें से 28 शोधार्थियों का प्रवेश RET श्रेणी के तहत और 15 शोधार्थियों का प्रवेश RET-Exempted श्रेणी के तहत प्रवेश हुआ। अक्टूबर में RET श्रेणी के 13 शोधार्थियों को अचानक विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में सूचीबद्ध कर दिया गया जो अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जाति वर्ग (SC) और अनुसूचित जनजाति वर्ग (SC) के हैं। इनमें से कोई भी सामान्य वर्ग का नहीं है। इससे आरक्षित वर्ग के ये सभी शोधार्थी विश्वविद्यालय के नॉन-नेट फेलोशिप से वंचित हो जाएंगे और उन्हें छात्रावास की सुविधा भी नहीं मिल पाएगी। 

चांदनी यादव ने कहा, "हमारा प्रवेश मार्च 2025 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में पीएचडी पाठ्यक्रम में होता है। 8-10 महीने बाद भी हमें कोई प्रगति दिखाई नहीं देती है। अक्टूबर महीने में शोधार्थियों की एक सूची जारी की जाती है जिसमें आरक्षित वर्ग के 13 शोधार्थियों को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सम्बद्ध महाविद्यालयों में भेज दिया जाता है। जब हम इसके खिलाफ विश्वविद्यालय प्रशासन से शिकायत करते हैं तो संबंधित अधिकारी उनसे कहते हैं कि वे अपने-अपने शोध निर्देशकों का सहमति-पत्र लेकर आएं। एक सप्ताह बाद जब हम सहमति-पत्र लेकर जाते हैं तो वे कहते हैं कि अब यह सहमति-पत्र काम नहीं करेगा, अब प्रवेश मेरिट बेस्ड होगा। सम्बद्ध महाविद्यालयों में RET श्रेणी के शोधार्थी ही जाएंगे, RET-Exempted श्रेणी के शोधार्थी नहीं जाएंगे।"


चांदनी यादव के अलावा राहुल कुमार, नेहा मंडल, धर्मेंद्र कुमार डाहायत, नीसी, सुजीत यादव, सोनाली नरवरे, दीपशिखा गुप्ता, सीवाजा, अभिषक कुमार, मीशांत राज और शिवम वर्मा का नाम ऐसे शोधार्थियों में शामिल है जिन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालयों में सूचीबद्ध किया गया है। सभी आरक्षित वर्गों से हैं। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन पिछले 10 महीने से उन्हें दौड़ा रहा है। उन्होंने इतिहास विभाग के प्रशासनिक अधिकारियों पर जाति आधार पर ऐसा करने का आरोप लगाया है। इस संदर्भ में विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से कोई भी अधिकारिक बयान अभी तक नहीं आया है। 


दूसरी ओर, भगतसिंह स्ट्डेंट मोर्चा ने धरनारत शोधार्थियों को अपना समर्थन दिया है। संगठन ने धरनारत शोधार्थियों को मुख्य परिसर में प्रवेश देने की मांग की है। साथ ही उसने धरनारत शोधार्थियों की मांग पूरी नहीं होने तक पीएचडी प्रवेश प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग की है। 

लखनऊ स्थित बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के सीनियर रिसर्च फेलो बसंत कुमार कन्नौजिया ने धरनारत शोधार्थियों के साथ हो रहे भेदभाव को भारतीय संविधान का अपमान बताया है। सोशल साइट 'फेसबुक' पर धरनारत शोधार्थियों की फोटो साझा करते हुए लिखा है, "वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) आज शिक्षा का नहीं, बल्कि जातिवादी सत्ता के दमन का केंद्र बनता जा रहा है। इतिहास विभाग के अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के शोध छात्रों का केंद्रीय कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना इस बात का जीवित प्रमाण है कि संविधान केवल किताबों में बचा है, प्रशासन में नहीं।"

आरक्षित वर्ग के शोधार्थियों के धरने की खबर सामने आते ही राजनीति भी तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी की प्रदेश प्रवक्ता डॉ. नेहा यादव ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा, "पुनः बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) जैसे प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में जातिगत भेदभाव का उदाहरण सामने आया है जिसमें अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के शोधार्थियों के साथ खुला अन्याय हो और प्रशासन मौन साधे रहे तो यह केवल एक विभाग की समस्या नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों पर सीधा हमला है। उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन से सवाल भी पूछा हैः जब शुल्क DMC का लिया गया, तो आरक्षित वर्ग के छात्रों को ही बाहर क्यों किया गया? केवल RET और केवल आरक्षित वर्ग को ही क्यों निशाना बनाया गया? क्या BHU में सामाजिक न्याय सिर्फ काग़ज़ों में है? 

सपा नेता डॉ. नेहा यादव


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