जयंती विशेषः विचारों से द्विजों की आर्य श्रेष्ठता को चुनौती देने वाली शख्सियत ‘पेरियार’

आज द्रविण आंदोलन के प्रणेता और महान समाज सुधारक ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' जी की 148वीं जयंती है। इस अवसर पर वनांचल एक्सप्रेस परिवार की ओर से उन्हें सादर नमन! – संपादक 

written by सिद्धार्थ रामू

ई.वी. रामासामी नायकर 'पेरियार' का जन्म 17 सितंबर 1879 को हुआ था। उन्होंने उत्तर भारत के द्विजों की आर्य श्रेष्ठता, मर्दवादी दंभ, राष्ट्रवाद और शोषण-अन्याय के सभी रूपों को चुनौती दी थी। भारतीय समाज और व्यक्ति का मुकम्मल आधुनिकीकरण जिन चिंतकों के विचारों के आधार पर होना है, उनमें ई.वी. रामासामी पेरियार अग्रणी हैं। पेरियार ने उन सभी बिंदुओं को चिह्नित और रेखांकित किया है जिनका खात्मा भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की अनिवार्य शर्त है।

ई.वी. रामासामी नायकर ‘पेरियार’ भारत की प्रगतिशील श्रमण बहुजन-परंपरा के ऐसे लेखक हैं जिन्होंने उत्तर भारत के द्विजों की आर्य श्रेष्ठता और मर्दवादी दंभ, राष्ट्रवाद, ब्राह्मणवाद, वर्ण-जाति व्यवस्था, ब्राह्मणवादी पितृसत्ता और शोषण-अन्याय के सभी रूपों को चुनौती दी। वर्चस्व, अन्याय, असमानता और दासता का कोई रूप उन्हें स्वीकार नहीं था। उनकी आवेगात्मक अभिव्यक्ति पढ़ने वालों को हिला देती है। तर्क-पद्धति, तेवर और अभिव्यक्ति की शैली की वजह से यूनेस्को ने 1970 में उन्हें 'दक्षिण एशिया का सुकरात' कहा था।

पेरियार 1920 से 1925 तक कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े रहे। वह औपचारिक तौर पर 1920 में कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। 1920 और 1924 में वह तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी के कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने। 1921 और 1922 में उसके सचिव रहे। इस दौरान उन्होंने महात्मा गांधी के सशक्त सहयोगी के रूप में काम किया। कांग्रेस और गांधी के साथ काम करते हुए बहुत जल्दी उन्हें अहसास हो गया कि यह पार्टी और गांधी उत्तर भारतीय आर्य-द्विज मर्दों के वर्चस्व को कायम रखने का उपकरण हैं। उन्होंने कांग्रेस पार्टी के भीतर काम करने के अपने अनुभवों के बारे में लिखाः

"जब मैं तमिलनाडु कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष था तो मैंने 1925 के सम्मेलन में एक प्रस्ताव प्रस्तुत किया था। उस प्रस्ताव में मैंने जातिविहीन समाज के निर्माण का प्रस्ताव किया था। मेरे मित्र चक्रवर्ती राजगोपालाचारी (राजाजी) ने इसे अस्वीकृत कर दिया था। मैंने यह भी अनुरोध किया था कि कांग्रेस के विभिन्न पक्षों और क्षेत्रों में सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व (वंचित एवं अल्पसंख्यक तबकों के लिए आरक्षण) का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन यह प्रस्ताव भी विषय समिति में थिरु वि. का. (एक सम्मानित तमिल विद्वान कल्यानासुन्दरानर) के द्वारा अस्वीकृत कर दिया गया। तब मुझे अपने प्रस्ताव के समर्थन में 30 प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर प्राप्त करने के लिए कहा गया था। श्री एस. रामानाथन ने 50 प्रतिनिधियों से हस्ताक्षर प्राप्त कर लिए। तब सर्वश्री सी. राजगोपालाचारी, श्रीनिवास आयंगर, सत्यमूर्ति और अन्य लोगों ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराया। उन्हें डर था कि अगर मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया तो कांग्रेस खत्म हो जाएगी।"

बाद में यह प्रस्ताव थिरु वि. का. और डॉ. पी. वरदाराजुलू के द्वारा रोक दिया गया। ब्राह्मण बहुत खुश हुए। इतना ही नहीं, उन्होंने मुझे सम्मेलन में बोलने की इजाजत भी नहीं दी। पेरियार ने बाद में कांग्रेस के बारे में लिखाः

"कांग्रेस पार्टी से अकेले ब्राह्मण और धनी लोग ही लाभ उठा रहे हैं। यह आम आदमी, गरीब आदमी और श्रमिक वर्गों के लिए अच्छा काम नहीं करेगी। यह बात मैं काफी लंबे समय से कह रहा था।"

कांग्रेस के अध्यक्ष या सचिव के रूप में तमिलनाडु में ब्राह्मणवाद और ब्राह्मणों के वर्चस्व को तोड़ने की हर कोशिश को कांग्रेस पार्टी पर अपना वर्चस्व कायम रखने वाले द्विज मर्दों ने नाकाम कर दिया था। इतना ही नहीं, गांधी ने स्पष्ट शब्दों में तमिलनाडु में सार्वजनिक तौर पर वर्ण-व्यवस्था की महानता और ब्राह्मणों की श्रेष्ठता की घोषणा की। भीखू पारेख ने अपनी किताब 'कोलेनिज्म, ट्रेडिशन एंड रिफॉर्म : एनालिसिस ऑफ गांधी पोलिटिकल डिस्कोर्स' में गांधी को उद्धृत करते हुए बताया है कि "वर्णाश्रण धर्म अभिशाप नहीं है, बल्कि यह उन बुनियादों में से एक है, जिन पर हिंदू धर्म टिका हुआ है और यह (वर्णाश्रम धर्म) बताता है कि धरती पर जन्म लेने का इंसान का उद्देश्य क्या है?" गांधी आगे कहते हैं, "ब्राह्मण हिंदू-धर्म और मानवता के सबसे खूबसूरत फूल हैं।"

वह आगे अपनी बात पर जोर देते हुए कहते हैं, "मुझे इनके (ब्राह्मणों) लिए कुछ करने की जरूरत नहीं है। ये अपनी हिफाजत खुद ही अच्छी तरह कर सकते हैं। ये पहले भी बहुत सारे तूफानों का सामना कर चुके हैं। मुझे गैर-ब्राह्मणों से सिर्फ इतना कहना है कि वे इन फूलों (ब्राह्मणों) को उनकी खुशबू और चमक के साथ रौंद देने की कोशिश कर रहे हैं।"

पेरियार ने वामपंथियों के साथ मिलकर भी काम किया लेकिन उन्होंने देखा कि वामपंथियों द्वारा जाति, पितृसत्ता और धर्म के गठजोड़ की उपेक्षा की जा रही है। वामपंथियों की वर्ग की यांत्रिक यूरोपीय धारणा, इतिहास की एकरेखीय आर्थिक व्याख्या और जाति, पितृसत्ता, धर्म, राष्ट्रवाद और वर्ग के गठजोड़ को समझ पाने में नाकामी के चलते पेरियार को उनसे भी अपना रास्ता अलग करना पड़ा।

पेरियार ने भारत के वामपंथियों के बारे में लिखा, "हमारे देश में साम्यवाद की जितनी भी बातें हो रही हैं, वे बकवास हैं... वे जातिवाद की दुष्टता और प्रतिक्रियावादी गांधी के दुष्प्रचार के कुप्रभावों के प्रति चिंतित नहीं लगते। वे उस राजाजी के प्रति चिंतित नहीं हैं जिनकी चिंता सिर्फ यह है कि ब्राह्मण कैसे सुख से जीवित रहेंगे। वे उस कांग्रेस पार्टी के बारे में चिंतित नहीं हैं, जो वर्णाश्रम धर्म को सही ठहराती है।" बाद में पेरियार ने तमिलनाडु में गैर-ब्राह्मणवाद की अगुवा जस्टिस पार्टी के साथ भी मिलकर काम किया।

1915-1916 के आस-पास मंझोली जातियों की ओर से सी.एन. मुलियार, टी. एन. नायर और पी. त्यागराज चेट्टी ने जस्टिस आंदोलन की स्थापना की थी। इन मंझोली जातियों में तमिल वल्लाल, मुदलियाल और चेट्टियार प्रमुख थे। इनके साथ ही इसमें तेलुगु रेड्डी, कम्मा, बलीचा नायडू और मलयाली नायर भी शामिल थे। 1916 में जस्टिस पार्टी की स्थापना हुई। तमिलनाडु में द्रविड़ आंदोलन की औपचारिक शुरुआत 1916 में तब हुई, जब जस्टिस पार्टी ने गैर-ब्राह्मण घोषणा पत्र जारी किया। ब्राह्मणवाद बनाम गैर-ब्राह्मणवाद का संघर्ष ही इस घोषणा पत्र का मूल स्वर था।

मद्रास प्रेसीडेंसी में ब्राह्मणों का वर्चस्व किस कदर था, इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1912 में वहां ब्राह्मणों की आबादी सिर्फ 3.2 प्रतिशत थी, जबकि 55 प्रतिशत जिला अधिकारी और 72.2 प्रतिशत जिला जज ब्राह्मण थे। मंदिरों और मठों पर ब्राह्मणों का कब्जा तो था ही, जमीन की मिल्कियत भी उन्हीं लोगों के पास थी। इस प्रकार तमिल समाज के जीवन के सभी क्षेत्रों में ब्राह्मणों का वर्चस्व था। इस वर्चस्व को तोड़ने के लिेए ब्राह्मण विरोधी आंदोलन शुरू हुआ।

1920 में मोंटेग-चेम्सफोर्ड सुधारों के अनुसार मद्रास प्रेसीडेंसी में एक द्विशासन प्रणाली बनायी गई जिसमें प्रेसीडेंसी में चुनाव कराने के प्रावधान किए गए। इस चुनाव में जस्टिस पार्टी ने भाग लिया और एक गैर-ब्राह्मणों के नेतृत्व और प्रभुत्व वाली जस्टिस पार्टी सत्ता में आई। इस पार्टी के नेतृत्व में पहली बार तमिलनाडु में 1921 में सरकारी नौकरियों में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण लागू हुआ।

पेरियार ने देखा कि जस्टिस पार्टी तमिलनाडु में ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को तोड़कर गैर-ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व को कायम करना चाहती है, लेकिन वर्चस्व और अन्याय के अन्य रूपों के खिलाफ वह चुप रहती है। वह एक ऐसे क्रांतिकारी बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे थे जिसमें वर्चस्व और अन्याय के सभी रूपों का खात्मा हो जाए। ऐसी दुनिया का निर्माण हो जहां किसी तरह का अन्याय और शोषण न हो। उन्होंने अपने आंदोलन को आत्मसम्मान आंदोलन ( सेल्फ रिस्पेक्ट मूवमेंट) नाम दिया। पेरियार ने 20 अक्टूबर 1945 को अपनी पत्रिका ‘कुदी आरसू’ में लिखाः

"देश में बहुत सारे आंदोलन चल रहे हैं... कांग्रेस पार्टी ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष कर रही है। जस्टिस पार्टी ब्राह्मणों के राजनीतिक वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है। आदि द्रविड़ पार्टी उच्च जातीय हिंदुओं के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है। वर्कर्स पार्टी पूंजीपतियों के वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष कर रही है। इस तरह हर एक पार्टी का उद्देश्य वर्चस्व के किसी एक रूप का खात्मा करना है। यदि कोई पार्टी वर्चस्व के सभी रूपों के खिलाफ एक साथ संघर्षरत है तो वह आत्मसम्मान आंदोलन है।"

पेरियार भारत में चल रहे स्वराज आंदोलन के उद्देश्य के संदर्भ में प्रश्न करते हैं, "हम जोर-शोर से स्वराज की बात कर रहे हैं। क्या स्वराज आप तमिलों के लिए है या उत्तर भारतीयों के लिए है? क्या यह आपके लिए है या पूंजीवादियों के लिए है? क्या स्वराज आपके लिए है या कालाबाजारियों के लिए है? क्या यह मजदूरों के लिए है या उनका खून चूसने वालों के लिए है?"

आत्मसम्मान आंदोलन के उद्देश्यों को स्पष्ट करते हुए पेरियार लिखते हैं, आत्मसम्मान आंदोलन का मकसद उन ताकतों का पता लगाना है, जो हमारी प्रगति में बाधक बनी हुई हैं। यह उन ताकतों का मुकाबला करेगा जो समाजवाद के खिलाफ काम करती हैं। यह समस्त धार्मिक प्रतिक्रियावादी ताकतों का विरोध करेगा।”

पेरियार का भविष्य की दुनिया का सपना मार्क्स-एंगेल्स के साम्यवाद के सपने से मेल खाता है। अपने लेख ‘भविष्य की दुनिया’ में अपने आदर्श समाज की परिकल्पना प्रस्तुत करते हुए उन्होंने तमिल पुस्तक 'इनि वारुम उल्लगम' में लिखाः

"नए विश्व में किसी को कुछ भी चुराने या हड़पने की आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी। पवित्र नदियों जैसे गंगा के किनारे रहने वाले लोग उसके पानी की चोरी नहीं करेंगे। वे केवल उतना ही पानी लेंगे, जितना उनके लिए आवश्यक है। भविष्य के उपयोग के लिए वे पानी को दूसरों से छिपाकर नहीं रखेंगे। यदि किसी के पास उसकी आवश्यकता की वस्तुएं प्रचुर मात्रा में होंगी तो वह चोरी के बारे में सोचेगा तक नहीं। इसी प्रकार किसी को झूठ बोलने, धोखा देने या मक्कारी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि उससे उसे कोई प्राप्ति नहीं हो सकेगी। नशीले पेय किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। न कोई किसी की हत्या करने का ख्याल दिल में लाएगा। वक्त बिताने के नाम पर जुआ खेलने, शर्त लगाने जैसे दुर्व्यसन समाप्त हो जाएंगे। उनके कारण किसी को आर्थिक बरबादी नहीं झेलनी पड़ेगी।"

इसी किताब में वह आगे लिखते हैः

‘‘पैसे की खातिर अथवा मजबूरी में किसी को वेश्यावृत्ति के लिए विवश नहीं होना पड़ेगा। स्वाभिमानी समाज में कोई भी दूसरे पर शासन नहीं कर पाएगा। कोई किसी से पक्षपात की उम्मीद नहीं करेगा। ऐसे समाज में जीवन और काम-संबंधों को लेकर लोगों का दृष्टिकोण उदार एवं मानवीय होगा। वे अपने स्वास्थ्य की देखभाल करेंगे। प्रत्येक व्यक्ति में आत्मसम्मान की भावना होगी। स्त्री-पुरुष दोनों एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करेंगे और किसी का प्रेम बलात् (जबरन) हासिल करने की कोशिश नहीं की जाएगी। स्त्री-दासता के लिए कोई जगह नहीं होगी। पुरुष सत्तात्मकता मिटेगी। दोनों में कोई भी एक-दूसरे पर बल-प्रयोग नहीं करेगा। आने वाले समाज में कहीं कोई वेश्यावृत्ति नहीं रहेगी।“

भविष्य के जिस समाज का सपना पेरियार देखते हैं, उसकी भारत में स्थापना की पहली शर्त वह अंबेडकर की तरह जाति के विनाश को मानते थे। उनका मानना था कि वर्ण-जाति की रक्षा के लिए हिंदू-धर्म की स्थापना की गई। वर्ण-जाति की रक्षा के लिए जन्म लेने वाले ईश्वरों को गढ़ा गया और मनुस्मृति, रामायण, गीता, पुराणों, आदि की रचना की गई। उन्होंने लिखा,इस जाति-व्यवस्था ने भारतीय समाज को जड़ और बर्बर समाज में तब्दील कर दिया है।”

1959 में उन्होंने लिखा, "हमारे देश में जाति के विनाश का मतलब है- भगवान, धर्म, शास्त्र और ब्राह्मणों (ब्राह्मणवाद) का विनाश। जाति तभी खत्म हो सकती है, जब ये चारों भी खत्म हो जाएं। यदि इसमें से एक भी बना रहता है तो जाति का विनाश नहीं हो सकता।"

ब्राह्मणों के खात्मे से उनका सीधा मतलब ब्राह्मणवाद के खात्मे से है। इस संदर्भ में वह लिखते हैं कि उन्हें "ब्राह्मण-प्रेस द्वारा ब्राह्मण-विरोधी के रूप में चित्रित किया गया है। किन्तु, मैं व्यक्तिगत रूप से किसी भी ब्राह्मण का दुश्मन नहीं हूं। एकमात्र तथ्य यह है कि मैं ब्राहमणवाद का धुर-विरोधी हूं। मैंने कभी नहीं कहा कि ब्राह्मणों को खत्म किया जाना चाहिए।"

पेरियार धर्म को प्रभुत्व और अन्याय का पोषक मानते हैं। वह सभी धर्मों को खारिज करते हुए विज्ञान और बुद्धिवाद का समर्थन करते हैं। वह धर्माचार्यों और विज्ञान के समर्थक बुद्धिवादियों की तुलना करते हुए लिखते हैं, धर्माचार्य सोचते हैं कि परंपरा-प्रदत्त ज्ञान ही एकमात्र ज्ञान है; उसमें कोई भी सुधार संभव नहीं है। अतीत को लेकर जो पूर्वाग्रह और धारणाएं प्रचलित हैं, वे उसमें किसी भी प्रकार के बदलाव के लिए तैयार नहीं होते।”

पेरियार ने गैर-द्विजों और महिलाओं से आह्वान किया कि वे “उस ईश्वर को नष्ट कर दें जो तुम्हें शूद्र कहता है। उन पुराणों और महाकाव्यों को नष्ट कर दो जो हिंदू ईश्वर को सशक्त बनाते हैं।” उनका मानना था कि “हिंदू-धर्म और जाति-व्यवस्था नौकर और मालिक का सिद्धांत स्थापित करते हैं।”

पेरियार ने ऐसा केवल कहा नहीं, बल्कि अपने अनुयायियों के साथ ऐसा किया भी। उन्होंने मनुस्मृति और रामायण को जलाया। रामायण की हकीकत को सामने लाने के लिए उन्होंने रामायण का एक मुकम्मल पाठ ‘रामायण पादीरंगल’ प्रस्तुत किया जो 1959 में अंग्रेजी भाषा में ‘द रामायण : अ ट्रू रीडिंग’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इसका हिंदी अनुवाद 1968 में ‘सच्ची रामायण’ के नाम से ललई सिंह यादव ‘पेरियार’ ने प्रकाशित किया जिसका अनुवाद राम आधार ने किया था।

पेरियार की नजर में रामायण कोई धार्मिक किताब नहीं है। यह एक राजनीतिक ग्रंथ है जिसका उद्देश्य आर्यों का अनार्यों पर, ब्राह्मणों का गैर-ब्राह्मणों पर, पुरुषों का महिलाओं पर वर्चस्व और वर्चस्व के अन्य रूपों को न्यायसंगत ठहराना है। सच्ची रामायण की भूमिका में पेरियार लिखते हैं, “इनके मूल आख्यानों का सावधानी से विश्लेषणात्मक अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि जो भी घटनाएं हुईं, वे असभ्य और बर्बर थीं।” इनकी कथाओं को इस तरह से लिखा गया है कि ब्राह्मण दूसरों की नजर में महान दिखें; महिलाओं को दबाया जा सके और उनको दासी बनाया जा सके। इनका उद्देश्य उनकी रूढ़ियों और मनु की संहिता को समाज में लागू कराना है।”

पेरियार पितृसत्ता के मूल ढांचे को सीधी चुनौती देते हैं। पेरियार की क्रांतिकारी प्रगतिशील सोच सबसे ज्यादा उनके स्त्री संबंधी चिंतन में सामने आती है। पेरियार महिलाओं की ‘पवित्रता’ या स्त्रीत्व की दमनकारी अवधारणा के कटु-विरोधी थे। उनका कहना था, "यह मान्यता कि केवल महिलाओं के लिए पवित्रता आवश्यक है, पुरुषों के लिए नहीं; इस विचार पर आधारित है कि महिलाएं पुरुषों की संपत्ति हैं। यह मान्यता वर्तमान में महिलाओं को निकृष्ट दर्जे का साबित करने की द्योतक है।"

पेरियार महिलाओं के शिक्षा प्राप्त करने, काम करने, अपने ढंग से जीने और प्यार करने के अधिकार के जबरदस्त समर्थक थे। इस मुद्दे पर उनके विचार इतने क्रांतिकारी थे कि द्रविड़ कड़गम के उनके कई घोर समर्थकों को भी वे रास नहीं आए। इस वजह से पार्टी ने न तो उनका प्रचार किया और न ही उनके अनुरूप आचरण।

स्त्रीवादी व पेरियार के विचारों की अध्येता वी. गीता ने हाल में 19वीं सदी की समाज-सुधारक सावित्रीबाई फुले की स्मृति में आयोजित एक परिचर्चा में भाग लेते हुए कहा था, ‘‘पेरियार के क्रांतिकारी विचारों को दरकिनार कर उन्हें केवल आरक्षण, भौंडे नास्तिकवाद और कटु ब्राह्मण-विरोध के प्रतिपादक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है और जाति, ऊंच-नीच, लिंग व सेक्स आदि से जुड़े प्रश्नों पर उनके विचारों को मानो किसी अलमारी में बंद करके भुला दिया गया है।"

श्रम और पूंजी के संघर्ष में पेरियार श्रमिक वर्ग के साथ खड़े होते हैं। वह साफ शब्दों में लिखते हैं कि “यह श्रमिक ही है जो विश्व में सब कुछ बनाता है लेकिन श्रमिक ही चिंताओं, कठिनाइयों और दुःखों से गुजरता है।” पेरियार ने एक ऐसे समाज की कल्पना की जिसमें शोषण और अन्याय का नामो-निशान नहीं होगा। उस दुनिया का खाका खींचते हुए वह लिखते हैं, एक समय ऐसा आएगा, जब धन-संपदा को सिक्कों में नहीं आंका जाएगा, न सरकार की जरूरत रहेगी। किसी भी मनुष्य को जीने के लिए कठोर परिश्रम नहीं करना पड़ेगा। ऐसा कोई काम नहीं होगा, जिसे ओछा माना जाए या जिसके कारण व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखा जाए।”

बर्बर माध्यकालीन मूल्यों और विचारों में जी रहे भारत को पेरियार के दर्शन, चिंतन और विचारों की सख्त जरूरत हैं।

(नोटः लेखक सिद्धार्थ रामू वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं। इससे वनांचल एक्सप्रेस का सहमत होना जरूरी नहीं है।)


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