(आज देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार की 118वीं जयंती है। इस मौके पर वनांचल एक्सप्रेस संक्षेप में उनका परिचय प्रकाशित कर रहा हैः संपादक)
वनांचल एक्सप्रेस ब्यूरो
देशभक्त
रत्नाप्पा कुम्भार का पूरा नाम डॉ. रत्नाप्पा भरमाप्पा कुम्भार है। वह एक महान
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, भारतीय संविधान सभा
के सदस्य, महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन के प्रणेता,
लोकसभा सांसद, महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष
और पद्मश्री से सम्मानित शख्सियत थे। उन्होंने बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी
के साथ भारतीय संविधान के अंतिम मसौदे पर हस्ताक्षर भी किया था।
जीवन परिचय
पद्मश्री डॉ. रत्नाप्पा भरमाप्पा कुम्भार का जन्म 15 सितंबर 1909 को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के शिरोल तहसील क्षेत्र के नीमशीर गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम भरमाप्पा कुम्भार और मां का नाम बालाबाई था। उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा नीमशीर गांव में ही ली थी। आगे की पढ़ाई के लिए वह कोल्हापुर चले गए थे। वहां राजाराम हाई स्कूल से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने 1933 में राजाराम कॉलेज से अंग्रेजी विषय में स्नातक की उपाधि हासिल की। फिर वे कानून की पढ़ाई करने लगे। बाद में पुणे विश्वविद्यालय ने उन्हें डी.लिट की मानद उपाधि से नवाजा। उन्होंने 1934 में पार्वती देवी से शादी की। उनकी तीन बेटियां हैं।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान
डॉ. रत्नाप्पा ने 15 फरवरी 1938 को सामाजिक कार्यकर्ता एवं पत्रकार माधवराव बागल और कवि दिनाकरा देसाई के साथ मिलकर ‘प्रजापरिषद’ नामक संगठन की स्थापना की। इसके बैनरतले वे लोगों को रियासतों के शासकों के खिलाफ लामबद्ध करने लगे। उन्हें लोगों का समर्थन भी मिलने लगा था। इससे नाराज कोल्हापुर रियासत के शासकों ने 8 जुलाई 1939 को उन्हें और देसाई को गिरफ्तार कर लिया। कोल्हापुर की रियासत ने उन पर जुर्माना लगाया। वहां से रिहा होने के बाद उन्होंने ‘भारत छोड़ो’ आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसकी वजह से उन्हें छह साल तक भूमिगत रहना पड़ा था। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति उनके समर्पण और कार्यों की वजह से लोगों ने उन्हें देशभक्त की उपाधि दी। इसकी वजह से उन्हें देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार कहा जाता है।
राजनीतिक योगदान
देश की आजादी के बाद डॉ. रत्नाप्पा ने 24 जनवरी 1950 को बॉम्बे प्रांत से भारतीय संविधान सभा के सदस्य के रूप में शपथ ली। उन्होंने भारतीय संविधान के अंतिम मसौदे पर बाबा साहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी के साथ हस्ताक्षर किए। वह1950 में भारतीय संसद के सदस्य भी बने। वह 1952 में देश में पहली बार हुए आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी से लोकसभा सदस्य (सांसद) के रूप में निर्वाचित हुए। वह विदेश मंत्रालय की स्थायी सलाहकार समिति के सदस्य भी बने। उन्होंने भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की स्थायी सलाहकार समिति के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।
इचलकरंजी निवासी देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार महाराष्ट्र विधानसभा में शिरोल विधान सभा/परिषद सीट से करीब 28 साल तक विधायक रहे। वह 1962 से 1982 तक लगातार 20 साल तक विधान परिषद में शिरोल का प्रतिनिधित्व करते रहे। वह 1974 से 1978 तक महाराष्ट्र सरकार में गृह मंत्री और खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री भी रहे। 1982 के चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। हालांकि समाज सेवा के क्षेत्र उनके योगदान के लिए भारत सरकार ने 1985 में उन्हें पद्मश्री अवार्ड से नवाजा। वह 1990 में एक बार फिर से शिरोल विधानसभा से निर्वाचित हुए। वह 1995 में महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष बने। 23 दिसंबर 1998 को हार्ट अटैक की वजह से उनकी मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय भी वह महाराष्ट्र विधानसभा के सदस्य थे।
शिक्षा और सहकारिता क्षेत्र में योगदान
डॉ. रत्नाप्पा ने महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार ने 1933 में शाहाजी लॉ कॉलेज, 1955 में पंचगंगा कोऑपरेटिव सुगर फैक्टरी, 1957 में डॉ. रत्नाप्पा कुम्भार कॉलेज ऑफ कॉमर्स, 1960 में दादा साहेब मग्दम हाई स्कूल, 1961 में नव महाराष्ट्रा कोऑपरेटिव प्रिंटिंग एवं पब्लिकेश सोसाइटी लिमिटेड, 1963 में कोल्हापुर जनता सेंट्रल को-ऑपरेटिव कंज्यूमर स्टोर्स, 1963 में रत्नदीप हाई स्कूल इचलकरांजी, 1968 में कोल्हापुर जिला शेतकारी वींणकारी सहकारी सूत गिरानी लिमिटेड, इचलकरांजी, 1971 में नाइट कॉलेज ऑफ आर्ट्स ऐंड कॉमर्स कोल्हापुर और 1975 में कोल्हापुर एल्यूमिना इंडस्ट्री (1975) की स्थापना की। कोल्हापुर में देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार कॉलेज ऑफ कॉमर्स का संचालन आज भी हो रहा है। वह इसके संस्थापक अध्यक्ष थे। नागपुर के कांप्टी में रामदास खोपे ने देशभक्त रत्नाप्पा कुम्भार विद्यालय की स्थापना है जिसका संचालन आज भी किया जा रहा है।

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