देश की आजादी के सात दशक बाद भी स्मारक को तरस रहा 13 वर्षीय यह शहीद

 देवरिया जिले के नौतन हथियागढ़ निवासी शहीद राम चंद्र विद्यार्थी की पुण्यतिथि पर विशेषः-

written by राम विलास प्रजापति

देश की आजादी के सात दशक बाद भी देवरिया जिले का 13 वर्षीय शहीद राम चंद्र 'विद्यार्थी' आज भी एक मुकम्मल स्मारक और प्रतिमा की बाट जोह रहा है लेकिन किसी भी सरकार शहीद को उसके शहादत के सम्मान की चिंता नहीं है। कुम्हार समुदाय से आने वाले रामचन्द्र विद्यार्थी का जन्म एक अप्रैल 1929 को उत्तर प्रदेश के देवरिया जनपद के नौतन हथियागढ़ गांव में हुआ था। इनके जन्म के आठवें दिन भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेंबली मे बम फेंका था। इनके पिता का नाम बाबूलाल और माता का नाम मोतीरानी देवी है। प्राथमिक शिक्षा के लिए रामचन्द्र का नामांकन सहोदरपट्टी गांव के प्राथमिक विद्यालय मे कराया गया। वे बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे और आसपास के प्रति संवेदनशील रहते थे । बचपन में इनके दादा भरदुल जी वीरों की कहानियां सुनाया करते थे। ऐसी कहानियों को सुनकर वे काफी रोमांचित होते थे। यही से इनके जेहन मे देशभक्ति का जज्बा अंकुरित हुआ। प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद इनका नामांकन नौतन से 12 किमी. दूर बसंतपुर धूसी विद्यालय में कराया गया। इनकी प्रखर बुद्धि से प्रभावित होकर विद्यालय के गुरजन इनसे प्यार करते और बच्चे भी आदर करते थे। रामचन्द्र अपने अन्य तीन भाइयों से बड़े थे। उनमें से एक भाई रामबड़ाई अभी भी जीवित हैं।  


उस समय आठ अगस्त  सन् 1942 को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन बम्बई मे चल रहा था। महात्मा गांधी ने देश की जनता के उत्साह को देखते हुए अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा दे दिया। इसके पहले कांग्रेस ने यह नारा नहीं दिया था। अधिवेशन के रुख को देखते हुए ब्रिटिश हुकूमत ने अधिवेशन स्थल पर घेरा डाल दिया था। चप्पे चप्पे पर अधिकारी, सीआईडी के जवान और पुलिस लगी थी। अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव ज्योही पास हुआ, चारो तरफ से पुलिस के जवानों ने सक्रियता दिखाई और रातो रात कांग्रेस के सभी बड़े नेता गिरफ्तार कर लिये गये। गांधी, नेहरू भी गिरफ्तार कर लिये गये। इनसे निचले पायदान के नेता अधिवेशन स्थल से किसी तरह भाग निकले और वे लोग अपने अपने क्षेत्रों में जाकर आंदोलन को सक्रिय करने मे लग गये। नेताओं की गिरफ्तारी की खबर जंगल की आग की तरह पूरे देश में फैल गई, जनता सड़क पर आ गयी। पूरे देश में तूफान मच गया। सरकारी कर्मचारी भी जनता के साथ आ गये। उस समय नौजवान, स्त्री. पुरुष सभी अंग्रेजों भारत छोड़ो का नारा लगा रहे थे। सरकारी वस्त्रों की होली जलाई गई। लोगों ने सरकारी कार्यालयों, कचहरी थानो पर अपना कब्जा जमा लिया। अंग्रेजों ने जनक्रांति को बन्दूक की गोलियों से दबाने का काम किया। क्रांति की वह आग बसंतपुर धूसी क्षेत्र मे भी पहुंची और पूरे क्षेत्र को अपने आगोश में ले लिया।।     

14 अगस्त को बसंतपुर धूसी कालेज से क्रांतिकारियों का एक जत्था तिरंगा झण्डा लिये 'ब्रिटिश हुकूमत मुर्दाबाद', 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का नारा लगाते हुए देवरिया मुख्यालय की तरफ बढ़ा। इस टोली का नेतृत्व बसंतपुर धूसी के प्रधानाध्यापक यमुना राव कर रहे थे। 'इंकलाब जिन्दाबाद' के नारे से आकाश गूंज रहा था। पैदल मार्च करते हुए यह टोली देवरिया कचहरी मे जिलामजिस्टे्ट के कार्यालय पर पहुंच गई। इस टोली के साथ देवरिया नगर सहित आसपास के लोग भी आ गये थे। हजारों की तादाद थी जिलाधिकारी के कार्यालय पर लगे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहराना था। अभी लोग सोच बिचार ही कर रहे थे कि यह तेरह वर्ष का क्रांतिकारी बालक तिरंगा लेकर आगे बढ़ गया और झण्डा फहराने के लिए अन्य साथियों की मदद से ऊपर छत पर चढ़ गया। अंग्रेजी फौज के साथ ज्वाइंट मजिस्ट्रेट ठाकुर उमराव सिंह वहां पहुंच गया और लाठीचार्ज करा दिया। भगदड़ मच गयी लेकिन रामचन्द्र कहां भागने वाला थे। इऩके अंदर तो देश को आजाद कराने का जज्बा था। 

मजिस्ट्रेट ने रामचन्द्र को बच्चा समझकर नीचे उतरने को कहा और गोली मार देने की धमकी दी लेकिन विद्यार्थी रामचन्द्र ने तिरंगा फहरा दिया। ठाकुर उमराव सिंह अपने को रोक न सका और गोली चलाने का आदेश दे दिया। बस क्या था? विद्यार्थी रामचन्द्र का सीना अंग्रेजों की गोलियों से छलनी हो गया। वह बालक धड़ाम से नीचे गिरा। वह खून से लतपथ था। उसके साथियों ने उसे लच्छीराम पोखरे पर लाया जहां उन्होंने अंतिम सांस ली। उस समय राम चंद्र विद्यार्थी की उम्र महज 13 साल 4 महीने 13 दिन थी। वहाँ से उनके पार्थिव शरीर को नौतनहथियागढ़ के पास छोटी गण्डक के किनारे लाया गया। उनके शव को तिरंगे में लपेटा गया और हजारों की संख्या के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया। 1949 मे प्रधानमंत्री नेहरु नौतनहथियागढ़ आये। उनके परिवार वालों से मिले तथा शहीद के प्रतीक के तौर पर  उन्होंने एक चांदी की थाली और एक गिलास उनके परिवार के लोगों को सुपुर्द किया। शहीद के घर को भी अंग्रेजों ने जला दिया था और परिवार के लोग खानाबदोश की जिंदगी जीने को मजबूर हो गये थे। आजादी के बाद भी सरकार ने शहीद को नजरंदाज किया और आज तक उनकी एक आदम कद मूर्ति भी नहीं लग सकी। कई बार कोशिश हुई एक स्मारक बनाने को लेकर लेकिन विभिन्न राजनीतिक पार्टियों की सरकारों ने इस बात को कभी भी गम्भीरता से नहीं लिया।

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